दिवाली पर लाल बोर के बिना अधूरी मानी जाती है मां लक्ष्मी की पूजा, जानिए इस छोटे फल का खास महत्व

Diwali Special: दिवाली पर भीलवाड़ा में लाल बोर की मांग बढ़ जाती है। मां लक्ष्मी की पूजा में इस छोटे से फल को रखने की सदियों पुरानी परंपरा है। जानिए आखिर क्यों खास है मेवाड़ का यह मौसमी फल।


November 3, 2026 • by

Diwali Special Pooja Tips: दिवाली पर मां लक्ष्मी की पूजा में इस्तेमाल होने वाला एक खास फल इन दिनों राजस्थान के भीलवाड़ा के बाजारों में लोगों का ध्यान खींच रहा है। आकार में छोटा और दिखने में बेहद साधारण यह फल मेवाड़ की पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। लाल बोर के नाम से पहचाने जाने वाले इस मौसमी फल के बिना भीलवाड़ा के कई घरों में लक्ष्मी पूजन की थाली अधूरी मानी जाती है। यही वजह है कि दीपावली नजदीक आते ही इसकी मांग बढ़ने लगती है।

दिवाली के बाजार में बढ़ी लाल बोर की रौनक

दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में चहल-पहल बढ़ गई है। लोग घरों की साफ-सफाई, सजावट, मिठाइयों और पूजा-पाठ की सामग्री की खरीदारी में जुटे हुए हैं। खासकर मां लक्ष्मी की पूजा के लिए इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक वस्तुओं की मांग बढ़ने लगी है। इसी बीच भीलवाड़ा के बाजारों में लाल बोर की आवक ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। स्थानीय लोग इस फल को खरीदने के लिए बाजार पहुंच रहे हैं, क्योंकि दिवाली के दिन इसे पूजा की थाली में रखने की पुरानी परंपरा है।

मां लक्ष्मी के पूजन से जुड़ी है सदियों पुरानी परंपरा

मेवाड़ के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले भीलवाड़ा में लाल बोर का धार्मिक और पारंपरिक महत्व माना जाता है। यहां दिवाली के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करते समय लाल बोर को अन्य पूजा सामग्री और फलों के साथ रखा जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और पीढ़ी दर पीढ़ी इसका पालन किया जा रहा है। यही कारण है कि आधुनिक समय में भी लोग दिवाली की खरीदारी के दौरान इस छोटे से फल को खरीदना नहीं भूलते।

40 वर्षों से दिवाली पर लाल बोर बेच रहे व्यापारी

लाल बोर के महत्व को लेकर स्थानीय व्यापारी रामपाल बताते हैं कि दीपावली के दिन मां लक्ष्मी की पूजा में इस फल को रखने की परंपरा सदियों पुरानी है। वे खुद पिछले करीब 40 वर्षों से दिवाली के अवसर पर लाल बोर की बिक्री कर रहे हैं। उनके मुताबिक, जैसे-जैसे दीपावली नजदीक आती है, वैसे-वैसे इसकी मांग भी बढ़ने लगती है। भीलवाड़ा के लगभग हर घर में लक्ष्मी पूजन की थाली में लाल बोर को शामिल करने की परंपरा देखने को मिलती है। यही वजह है कि त्योहार के दिनों में इसकी बिक्री सामान्य दिनों की तुलना में काफी बढ़ जाती है।

जंगलों और पहाड़ियों में प्राकृतिक पैदावार

लाल बोर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे आम फलों की तरह बड़े व्यावसायिक बगीचों में नहीं उगाया जाता। यह भीलवाड़ा जिले के ग्रामीण इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और जंगली झाड़ियों में प्राकृतिक रूप से पैदा होता है। स्थानीय किसान और फल इकट्ठा करने वाले लोग इन क्षेत्रों से इसे संग्रहित करके बाजार तक पहुंचाते हैं। प्राकृतिक वातावरण में उगने के कारण इसकी उपलब्धता भी सीमित रहती है। यही वजह है कि यह फल सालभर बाजार में आसानी से नहीं मिलता और इसकी आवक मुख्य रूप से दिवाली के आसपास देखने को मिलती है।

दिवाली के सीजन में ही क्यों बढ़ जाती है इसकी मांग

लाल बोर की मांग बढ़ने की एक बड़ी वजह इसकी मौसमी उपलब्धता और धार्मिक परंपरा है। सामान्य दिनों में यह फल बाजारों में बहुत कम दिखाई देता है, लेकिन दीपावली का त्योहार आते ही इसकी खरीदारी शुरू हो जाती है। स्थानीय परिवार इसे विशेष रूप से लक्ष्मी पूजन के लिए खरीदते हैं। इसके अलावा कुछ लोग इसे पूजा में रखने के साथ-साथ खाने के लिए भी पसंद करते हैं। इस तरह धार्मिक महत्व और प्राकृतिक उपलब्धता दोनों मिलकर इसे दिवाली के बाजार का खास फल बना देते हैं।

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पूजा के साथ स्वाद के लिए भी खरीदते हैं लोग

लाल बोर का महत्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। दिवाली के दौरान बाजार पहुंचने वाले कई लोग इसे अन्य फलों और मिठाइयों के साथ खाने के लिए भी खरीदते हैं। इसका प्राकृतिक रूप से उगना और सीमित समय के लिए उपलब्ध होना इसे स्थानीय लोगों के बीच खास बनाता है। यही वजह है कि बाजार में इसकी मांग केवल धार्मिक परंपरा निभाने वाले परिवारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसे पसंद करने वाले दूसरे लोग भी खरीदारी करते हैं।

मेवाड़ की पहचान बन चुका है लाल बोर

भीलवाड़ा में लाल बोर आज केवल एक मौसमी फल नहीं, बल्कि दिवाली से जुड़ी स्थानीय संस्कृति और परंपरा का हिस्सा बन चुका है। बदलते समय के साथ पूजा-पाठ के तरीकों और खरीदारी के सामान में भले ही बदलाव आया हो, लेकिन इस छोटे से फल को लक्ष्मी पूजन में शामिल करने की परंपरा अब भी कायम है। दिवाली के दौरान बाजारों में इसकी मौजूदगी मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय मान्यताओं की याद दिलाती है। यही कारण है कि आकार में छोटा होने के बावजूद लाल बोर का दिवाली के त्योहार में अपना अलग महत्व है।

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