अब्दुल अब दरी नहीं बिछाएंगे, US चुनाव में अब्दुल अल-सैयद की जीत पर बोले असदुद्दीन ओवैसी

Abdul El-Sayed: अमेरिका के मिशिगन में अब्दुल अल-सैयद की ऐतिहासिक जीत पर असदुद्दीन ओवैसी ने बड़ा बयान दिया। बोले- 'अब दरी नहीं बिछाएंगे।' जानिए ओवैसी ने यूपी के मुसलमानों से क्या अपील की।


November 4, 2026 • by

Asaduddin Owaisi Reaction: अमेरिका के मिशिगन में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने अमेरिकी सीनेट का चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया है। वह अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम सांसद बन गए हैं। उनकी इस ऐतिहासिक जीत के बाद भारत में भी सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं।

AIMIM प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अब्दुल अल-सैयद की जीत पर खुशी जाहिर करते हुए उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने का संदेश दिया है। ओवैसी ने अपने बयान में कहा कि अब वक्त आ गया है कि मुसलमान अपनी सियासी ताकत पहचानें और किसी के पीछे चलने के बजाय अपनी राजनीतिक भागीदारी मजबूत करें।

ओवैसी का बयान बना चर्चा का विषय

असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अब्दुल अल-सैयद की जीत को लेकर एक पोस्ट साझा किया। इसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को संबोधित करते हुए लिखा, “एक अब्दुल मिशिगन में जीत गया, अब उत्तर प्रदेश के अब्दुल को अपनी सियासी पहचान मज़बूत करनी होगी। संघियों ने ‘अब्दुल’ को एक तंज़ में बदलने की बहुत कोशिश की है। वक़्त आ गया है कि हम दिखाएं कि अब्दुल अल्लाह के सिवा किसी की ग़ुलामी नहीं करता। अब दरी नहीं बिछाएंगे।”

‘अब्दुल’ शब्द को लेकर दिया सियासी संदेश

ओवैसी के इस बयान में ‘अब्दुल’ शब्द के जरिए राजनीतिक और सामाजिक पहचान का मुद्दा उठाया गया है। उन्होंने कहा कि जिस नाम को राजनीतिक तंज के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई, अब उसी पहचान को सम्मान और राजनीतिक ताकत के साथ सामने लाने का वक्त है। ‘अब दरी नहीं बिछाएंगे’ कहकर ओवैसी ने राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व को लेकर अपनी बात रखी। उनका यह संदेश खासतौर पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम समुदाय की भूमिका और प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा जा रहा है।

कौन हैं अब्दुल अल-सैयद?

कौन हैं अब्दुल अल-सैयद?

अब्दुलरहमान मोहम्मद अल-सैयद को अमेरिका की राजनीति में एक प्रगतिशील नेता के तौर पर जाना जाता है। 42 वर्षीय अल-सैयद मिस्र के प्रवासी परिवार से आते हैं। वह पेशे से डॉक्टर और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं। राजनीति में आने से पहले उन्होंने मिशिगन के वेन काउंटी और डेट्रॉइट शहर में स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारियां संभाली थीं। साल 2018 में उन्होंने मिशिगन के गवर्नर पद का चुनाव भी लड़ा था, हालांकि उस समय उन्हें सफलता नहीं मिली थी। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक सक्रियता जारी रखी और अब अमेरिकी सीनेट तक पहुंचने में कामयाबी हासिल की है।

माइक रोजर्स को हराकर हासिल की बड़ी जीत

मिशिगन की अमेरिकी सीनेट सीट के लिए हुए चुनाव में अब्दुल अल-सैयद का मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार और पूर्व सांसद माइक रोजर्स से था। यह मुकाबला अमेरिकी मध्यावधि चुनावों की सबसे चर्चित सीटों में शामिल था। चुनाव में अल-सैयद ने माइक रोजर्स को शिकस्त दी। एसोसिएटेड प्रेस ने भी उनकी जीत की पुष्टि की। इस जीत के साथ वह अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम अमेरिकी बन गए। उनकी सफलता को अमेरिका की राजनीति में मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिहाज से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

चुनाव प्रचार में ट्रंप के निशाने पर रहे अल-सैयद

चुनाव प्रचार के दौरान अब्दुल अल-सैयद को अपनी राजनीतिक नीतियों के साथ-साथ धार्मिक पहचान को लेकर भी कई तरह के हमलों का सामना करना पड़ा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन खेमे के नेताओं ने उन्हें निशाना बनाया। ट्रंप ने उनके खिलाफ ‘जिहादी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और उनकी अमेरिकी राजनीति में भूमिका को लेकर सवाल उठाए। एक चुनावी रैली में ट्रंप ने यह टिप्पणी भी की थी कि अल-सैयद सीनेट में जाने से पहले मेटल डिटेक्टर से गुजरने वाले इकलौते सीनेटर होंगे। इन बयानों को लेकर अमेरिका में धार्मिक पहचान और इस्लामोफोबिया पर बहस तेज हुई।

अपनी ही पार्टी के भीतर भी मिली चुनौती

अब्दुल अल-सैयद के लिए चुनावी सफर आसान नहीं रहा। उन्हें अपनी ही डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ा था। पार्टी के प्राइमरी चुनाव में उन्होंने सांसद हेली स्टीवंस को हराकर उम्मीदवार बनने का रास्ता साफ किया था। हालांकि, चुनाव से पहले हेली स्टीवंस ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन करने के बजाय रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स का समर्थन कर दिया। इसके बावजूद अल-सैयद ने अपना चुनावी अभियान जारी रखा और मिशिगन की अहम सीनेट सीट पर जीत हासिल की।

जीत के बाद कॉरपोरेट ताकतों पर उठाए सवाल

चुनाव में जीत हासिल करने के बाद अपने संबोधन में अब्दुल अल-सैयद ने अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में कॉरपोरेट कंपनियों और अरबपतियों के बढ़ते प्रभाव पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश की व्यवस्था को बड़े कॉरपोरेट घरानों और अरबपतियों के विशेष हितों ने अपने नियंत्रण में ले लिया है। उनके मुताबिक, लोकतंत्र का उद्देश्य आम नागरिकों की जरूरतों को पूरा करना होना चाहिए, न कि केवल ताकतवर और अमीर लोगों के हितों की रक्षा करना।

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आम अमेरिकी नागरिकों की चिंता

अल-सैयद ने अपने भाषण में अमेरिका में महंगाई और आम लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे अमीर और ताकतवर देश में लोगों के लिए राशन खरीदना, गाड़ी में पेट्रोल भरवाना, घर खरीदना और डॉक्टर को दिखाना इतना मुश्किल नहीं होना चाहिए। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों की पहुंच में लाने और आर्थिक परेशानियों को कम करने की जरूरत पर जोर दिया।

दूसरे देशों में युद्ध पर खर्च को लेकर भी उठाए सवाल

अब्दुल अल-सैयद ने अमेरिकी नागरिकों से मिलने वाले टैक्स के इस्तेमाल को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि टैक्स का पैसा लोगों और उनके बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने पर खर्च होना चाहिए, न कि दूसरे देशों के बच्चों पर बम गिराने में। उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा और आम नागरिकों की जरूरतों को प्राथमिकता देने की बात कही। उनके इस बयान को उनकी विदेश नीति और सामाजिक कल्याण से जुड़ी राजनीतिक सोच का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

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अमेरिका की राजनीति में नई पहचान बना गए अल-सैयद

अब्दुल अल-सैयद की जीत केवल मिशिगन की एक चुनावी सफलता नहीं है, बल्कि अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी एक नया अध्याय है। वहीं, असदुद्दीन ओवैसी ने इस जीत को उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी से जोड़ते हुए अपनी बात रखी है। अब देखना होगा कि ओवैसी का यह संदेश उत्तर प्रदेश की सियासत में किस तरह की चर्चा को जन्म देता है और आने वाले चुनावों में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा कितना प्रभावशाली बनता है।

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