जर्जर घर को AI ने बताया पक्का, हजारों गरीबों का PM Awas आवेदन हुआ रिजेक्ट; जानें पूरा मामला

PM Awas Yojana: अलीगढ़ में पीएम आवास योजना ग्रामीण की एआई जांच में 11,482 आवेदक पात्रता सूची से बाहर हो गए। आरोप है कि जर्जर मकानों को भी पक्का मानकर अपात्र कर दिया गया।


August 19, 2026 by

PM Awas Yojana Aligarh News: अलीगढ़ में प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत पात्र परिवारों के चयन को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने तकनीक के इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आवास योजना के लिए किए गए सर्वे और बाद की एआई जांच में जिले के 11,482 आवेदकों के नाम पात्रता सूची से बाहर हो गए। आरोप है कि कई ऐसे जर्जर मकानों की तस्वीरों को भी एआई जांच में पक्का मकान मान लिया गया, जिनमें रहने वाले परिवार आज भी खराब हालत में गुजर-बसर कर रहे हैं।

जर्जर मकान, फिर भी अपात्र

धनीपुर ब्लॉक की भटौला पंचायत के शेखूपुर गांव निवासी विजय कुमार का मामला इसी परेशानी की तस्वीर पेश करता है। विजय मजदूरी करके पत्नी पूजा और दो बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। परिवार जिस मकान में रहता है, उसकी छत कच्ची है और दीवारें मिट्टी व ईंटों के सहारे खड़ी हैं। बरसात के दिनों में परिवार को मकान की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है।

तस्वीर ने सुनाई अलग कहानी

विजय के मकान की वास्तविक स्थिति देखकर ग्राम प्रधान गिरीष कुमार ने उनका नाम प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण की पहली सूची में शामिल कराया था। परिवार को उम्मीद थी कि योजना के तहत उन्हें पक्का मकान बनाने के लिए आर्थिक सहायता मिलेगी। लेकिन बाद के सत्यापन और एआई आधारित जांच में मकान की तस्वीर को पक्के मकान के तौर पर दर्ज किए जाने के बाद उनका नाम पात्रता सूची से बाहर हो गया।

हजारों परिवारों पर असर

अलीगढ़ में आवास योजना के लिए कुल 19,461 आवेदकों को शुरुआती स्तर पर चिह्नित किया गया था। इसके बाद दूसरे चरण में सत्यापन और एआई जांच की प्रक्रिया पूरी की गई। इस प्रक्रिया के बाद 11,482 आवेदकों के नाम सूची से बाहर हो गए। अब करीब 7,980 आवेदक ही अंतिम सूची में रह गए हैं, जिन्हें योजना का लाभ दिए जाने की बात सामने आई है।

ये भी पढ़ें: बिजनौर में हरिद्वार मार्ग पर बह रहा मालन का पानी, हजारों बीघा फसल प्रभावित

852 पंचायतों में हुआ सर्वे

पीएम आवास योजना ग्रामीण के तहत पात्र परिवारों की पहचान के लिए अलीगढ़ जिले की सभी 12 ब्लॉकों की 852 ग्राम पंचायतों में सर्वे कराया गया था। इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी 296 सर्वेयरों को दी गई थी। सर्वे के दौरान ऐसे परिवारों की पहचान की गई, जिन्हें पक्के मकान की जरूरत थी और जो योजना की पात्रता के दायरे में आते थे।

सर्वे के बाद AI की जांच

प्रारंभिक सर्वे में 19 हजार से अधिक लोगों को आवास के लिए चिह्नित किया गया। इसके बाद दूसरे चरण में सत्यापन के साथ एआई आधारित जांच की गई। इसी जांच के दौरान बड़ी संख्या में आवेदक बाहर हो गए। ऐसे मामलों ने यह सवाल खड़ा किया है कि केवल मकान की तस्वीर के आधार पर उसकी वास्तविक स्थिति का आकलन कितना सही हो सकता है।

ईंट और दीवार से तय हुई पात्रता

जर्जर मकान में रहने वाले परिवारों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी मकान की बाहरी तस्वीर उसकी वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं बता सकती। कई पुराने मकानों में ईंट की दीवारें दिखाई देती हैं, लेकिन उनकी छत कमजोर हो सकती है, दीवारें जर्जर हो सकती हैं और पूरा ढांचा रहने के लिहाज से असुरक्षित हो सकता है। ऐसे में यदि तस्वीर के आधार पर मकान को पक्का मान लिया जाए तो वास्तविक जरूरतमंद परिवार योजना के लाभ से वंचित हो सकते हैं।

विजय कुमार का टूटा सपना

विजय कुमार का परिवार भी इसी स्थिति से प्रभावित बताया जा रहा है। मजदूरी पर निर्भर परिवार के लिए अपना पक्का घर बनाना आसान नहीं है। जर्जर मकान में रहने के बावजूद जब उनका नाम आवास योजना की सूची से बाहर हुआ तो परिवार की पक्के घर की उम्मीद को झटका लगा। गांव में उनका मामला इस बात को लेकर चर्चा में है कि तकनीकी जांच के साथ जमीनी सत्यापन कितना जरूरी है।

अब करीब आठ हजार नाम बाकी

आवास के लिए चिह्नित 19,461 आवेदकों में से 7,980 नाम अंतिम सूची में रह गए हैं। यानी शुरुआती सूची के मुकाबले बड़ी संख्या में आवेदकों को बाहर कर दिया गया। अब योजना के तहत अंतिम सूची में शामिल परिवारों को लाभ मिलने की उम्मीद है, जबकि बाहर हुए परिवारों के मामलों में पात्रता को लेकर सवाल बने हुए हैं।

तकनीक के साथ मानवीय जांच जरूरी

एआई आधारित जांच से बड़े स्तर पर आवेदनों की छंटनी करना आसान हो सकता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में मकानों की वास्तविक स्थिति कई बार तस्वीर से अलग होती है। कच्ची छत, कमजोर नींव, जर्जर दीवारें और बरसात में होने वाला नुकसान तस्वीर में स्पष्ट नजर नहीं आता। ऐसे मामलों में स्थानीय स्तर पर दोबारा जांच और भौतिक सत्यापन जरूरतमंद परिवारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

योजना का उद्देश्य और चुनौती

प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के पात्र परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराना है। ऐसे में पात्रता तय करने की प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल पारदर्शिता और तेजी ला सकता है, लेकिन यदि जर्जर मकानों को गलती से पक्का मान लिया जाए तो योजना के मूल उद्देश्य पर असर पड़ सकता है। अलीगढ़ में सामने आए 11,482 नामों के बाहर होने का मामला इसी चुनौती को सामने लाता है।

ये भी पढ़ें: आजम खान-जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े 10 ठिकानों पर ED की रेड, रामपुर से दिल्ली-सहारनपुर तक छापेमारी

फैक्ट फाइ

  • अलीगढ़ में कुल 12 ब्लॉक हैं।
  • जिले की 852 ग्राम पंचायतों में सर्वे कराया गया।
  • सर्वे की जिम्मेदारी 296 सर्वेयरों को दी गई थी।
  • आवास के लिए 19,461 आवेदक शुरुआती तौर पर चिह्नित किए गए।
  • एआई जांच और सत्यापन के बाद 11,482 नाम सूची से बाहर हो गए।
  • अब करीब 7,980 आवेदक अंतिम सूची में रह गए हैं।

सवालों के घेरे में AI जांच

अलीगढ़ का यह मामला यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या किसी परिवार के आवास की पात्रता केवल तस्वीर देखकर तय की जा सकती है। तकनीक प्रक्रिया को तेज जरूर कर सकती है, लेकिन गरीब परिवार के घर की वास्तविक स्थिति समझने के लिए जमीनी जांच भी उतनी ही जरूरी है। खासकर उन मकानों में, जहां बाहर से ईंट और दीवारें तो दिखाई देती हैं, लेकिन अंदर रहने वाले परिवार के लिए छत और पूरा ढांचा सुरक्षित नहीं है।

आगे क्या होगा

अब जिन आवेदकों के नाम अंतिम सूची से बाहर हुए हैं, उनके मामलों में वास्तविक स्थिति की जांच और पात्रता को लेकर उठ रहे सवाल महत्वपूर्ण हैं। विजय कुमार जैसे परिवारों के लिए उम्मीद इसी बात पर टिकी है कि उनके मकान की जमीनी स्थिति को सही तरीके से देखा जाए और यदि वे पात्र हैं तो उन्हें योजना का लाभ मिल सके। अलीगढ़ में सामने आया यह मामला सरकारी योजनाओं में तकनीक और मानवीय सत्यापन के बीच संतुलन की जरूरत को भी रेखांकित करता है।

Share: